कोरोना : "विनय न मानत जलधि जड़ गए तीनि दिन बीति। बोले राम सकोप तब भय बिनु होइ न प्रीति॥"

कोरोना : "विनय न मानत जलधि जड़ गए तीनि दिन बीति। बोले राम सकोप तब भय बिनु होइ न प्रीति॥"


वैश्विक स्तर पर अपना कहर ढा रही कोरोना बीमारी से बचाव व सुरक्षित रहने को सभी राष्ट्र-राज्य कोशिश कर रहे हैं, परन्तु उत्तर प्रदेश में इस आपदा से बचाव के लिये मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ द्वारा कड़ाई से उठाये जा रहे कदम पर रामचरित मानस की चौपाई एकदम फिट बैठती है कि


"विनय न मानत जलधि जड़
गए तीनि दिन बीति।
बोले राम सकोप तब
भय बिनु होइ न प्रीति॥"


वैसे, इस पर पूरा परिदृश्य देखें तो दूरदर्शन पर चल रहे धारावाहिक 'रामायण' पर यह आज का प्रसंग था। यह आंखों को सुख देकर बिसरा दी जाने वाली मनोरंजक विषय-वस्तु मात्र नहीं। बल्कि वर्तमान परिस्थिति में सिंहासनों को राजधर्म निर्वाह के लिए दिया जाने वाला अत्यंत महत्वपूर्ण संदेश है। इस संदेश की अनदेखी अवर्णनीय अनर्थ का कारण बन सकती है।


सर्व प्रथम, नीति व धर्म का पूर्ण निष्ठा से अनुपालन करते हुए परमात्मा ने तीन दिन तक समुद्र को मनाने की निमग्न साधना की। अखंड प्रार्थना की। मार्ग के बाधक "समुद्र की मर्यादा बनी रहे" - इस उदार आशय से, सर्वसमर्थ होने के बाद भी श्रीराम ने शक्ति का प्रयोग करने की जगह - आग्रह, याचना और निवेदन करने का मार्ग चुना। 
अतिशय अनुनय-विनय के बाद, स्वयं परमशक्ति "भी" इस कठोर-सत्य से परिचित हुई कि ; नीच और अधम लोग, निवेदन को निवेदन-कर्ता की 'असमर्थता' समझते हैं। ....उसका अट्टहास (मजाक) करते हैं।


ऐसी जड़ बुद्धि में उन्माद श्रेष्ठ होता है। वहां, अनुनय- विनय की भाषा या उपकार और परोपकार की बातों का कोई मोल नहीं। नीच-बुद्धि सिर्फ ताकत (जूते) की भाषा जानती, समझती व प्रयोग करती है। इसलिए उसके साथ लोकाचार की भाषा भी सिर्फ व सिर्फ जूते की ही होनी चाहिए। ऐसा न होने पर मार्ग का बाधक (समुद्र) सारे मान-मनौव्वल को तिनके बराबर भी महत्व न देकर अपने उन्मादी व अहंकारी हिचकोलों में अलमस्त रहता है।


अपने यहां प्रतिदिन गिरती लाशों के ढेर से दुनियाबी ताकतों का कलेजा मुंह को आ रहा है। भारत में भी सुरसा-मुख की तरह कोरोना विस्तार लेता जा रहा है।....कोहराम और मातम की मनहूस संभावनाओं की तरफ बढ़ते देश को बचाने के लिए, अब अनुनय-विनय का समय पूरा हो चुका है। एक दिन में 10-20 पाए जाने वाले कोरोना पाजिटिव की संख्या अब प्रतिदिन 1000 के पार पहुंच चुकी है।
अब, देश व समाज के गद्दारों से घरों में रहने या तबलीगियों से बाहर आकर खुद की मेडिकल-जांच करवाने की अपील करने का समय पूरा हो चुका है। लोगों की मर्यादा बची रहे - इस आशय से नीति व धर्म की सारी औपचारिकताएं पूरी हो चुकी हैं।


समाज के दुश्मनों से अब भी निवेदन करना - स्वयं सिंहासनों का अक्षम्य व अविस्मर्णीय अपराध होगा। कम्बखतों को लाठी से गिराए बगैर यह लाकडाउन पूरे देश को गहरी चोट देने वाले अनन्तकाल के लाकडाउन में झोंक देगा, अब यह कल्पना नहीं, आहट देती सच्चाई है। अब भी ढिलाई हुई तो लंका (कोरोना) विजय असम्भव हो जाएगी। (लेखक : अरविन्द कुमार त्रिपाठी उत्तर प्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार हैं 9452964509)


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