किसानों को आलू की फसल में पिछैैती-झुलसा बीमारी से बचाव के लिये सलाह
लखनऊ। उत्तर प्रदेश में गत दिवस से हो रही वर्षा आलू की फसल के लिए लाभ दायक है। परन्तु इसके पश्चात कोहरा पड़ने से आलू की फसल में पिछैेती-झुलसा की बीमारी आने की सम्भावना बढ़ जाती है। यह जानकारी निदेशक उद्यान डाॅ. एसबी शर्मा ने दी। उन्होंने किसान भाईयों को सलाह दी है कि वे इस बीमारी के प्रति सचेत रहे। इस बीमारी में पत्तियों एवं तने पर काले धब्बे बनते हैं, जो धीरे-धीरे बढ़ते रहते हैं और 02 दिन के अन्दर ही पूरी फसल की स्थिति जलने जैसी हो जाती है। यह बीमारी किसानों को तब दिखायी देती है जब ऊपर पत्तों पर काले धब्बे दिखायी देते है, तब बहुत देर हो चुकी होती है। उन्होंने सलाह दी है कि किसान भाई खेत का निरीक्षण करते वक्त पौधों के नीचे तक अन्दर के हिस्से का निरीक्षण कर देखें, कि अन्दर की पत्तियों पर कोई धब्बा तो नहीं है और तने की डण्डी काली तो नहीं पड़ रही है।

डाॅ. शर्मा ने बताया कि इस बीमारी के नियन्त्रण हेतु केन्द्रीय आलू अनुसंधान संस्थान, मोदीपुरम, मेरठ द्वारा किसानों को सलाह दी गई है कि ''वे मैन्कोजेब/प्रोपीनेब/क्लोरोथेलोंनील युक्त फफंदनाशक दवा का सुग्राही किस्मों के रोग पर 0.2-0.25 प्रतिशत की दर से अर्थात् 2.0- 2.5 किलोग्राम दवा 1000 लीटर पानी में घोलकर प्रति हैक्टेयर छिड़काव करें। उद्यान निदेशक ने किसानों को यह भी सलाह दी है कि जिन खेतों में बीमारी प्रकट हो चुकी हो उनमें किसी भी फफंदनाशक -साईमोक्सेनिल मैन्कोजेब का 3.0 किलोग्राम प्रति हैक्टेयर (1000 लीटर पानी) की दर से अथवा फेनोमिडोन मैन्कोजेब का 3.0 किलोग्राम प्रति हैक्टेयर (1000 लीटर पानी) की दर से अथवा डाईमेथोमार्फ 1.0 किलोग्राम मैन्कोजेब का 2.0 किलोग्राम (कुल मिश्रण 3.0 किग्रा.) प्रति हैक्टेयर (1000 लीटर पानी) की दर से छिड़काव किया जाए।

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